अलकनंदा आकाशगङ्गा की खोज इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?
Hindi translation of my post about the Alaknanda Galaxy
(This is a Hindi translation of my thread about the discovery of the Alaknanda galaxy by NCRA Pune Scientists. Thanks to @Adarshatva1 for the translation. Please forward to Hindi readers you think might be interested.)
NCRA पुणे के विज्ञानियों ने एक ऐसी खोज की है जो महाविस्फोट के बाद की प्रारम्भिक आकाशगङ्गाओं के निर्माण की विज्ञान की समझ को बदल कर रख सकती है।
उन्होंने एक आकाशगङ्गा खोजी है जिसका नाम उन्होंने अलकनंदा रखा है। यह एक साधारण सी आकाशगङ्गा है, तो फिर इस में क्या विशेष है?
(टिप्पणी: इस लेख के कुछ अनुच्छेद विज्ञान में थोड़ी अधिक गहराई से जाते हैं—हो सकता है कि आपकी उतनी रुचि न हो। आप चाहें तो तिरछे अक्षरों में लिखे (जैसे कि यह अनुच्छेद )छोड़ सकते हैं। लेख का बाकी हिस्सा फिर भी समझ में आ जाएगा।)
जेम्स वेब् स्पेस् टेलीस्कोप द्वारा खींची गई फोटो में अलकनन्दा एक बहुत-ही छोटी बिन्दी के समान दिखती है। यदि हम इसे जूम् कर के देखें , तो यह एक पतली केन्द्रीय चक्रिका (डिस्क्) और दो भुजाओं वाली साधारण-सी सर्पिल आकाशगङ्गा दिखती है। ब्रह्माण्ड में ऐसी अरबों आकाशगङ्गाएँ हैं।
अलकनन्दा का अभिरक्त विस्थापन
अलकनन्दा का अभिरक्त विस्थापन (Red shift) 4 है जो कि इसे विशेष बनाता है। इसका मतलब है कि हम अलकनन्दा की ओर आये हुए जिस प्रकाश को अभी देख रहे हैं , वह 12 अरब वर्ष पहले उत्सर्जित हुआ था।
हम यह कैसे जानते हैं ?
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि प्रकाश को ध्यान से देखने से हम बहुत-कुछ जान सकते हैं।
आप को मैं सरल शब्दों में समझाता हूँ — मान लीजिए हम अलकनन्दा के प्रकाश को एक विशेष प्रिज्म (prism) से गुजारते हैं। यह प्रकाश इन्द्रधनुष के रँगों में विभाजित हो जाता है। यदि आप इस spectrum को ज़ूम करेंगे , तो आपको कई पतली चमकीली ऊर्ध्वाधर (vertical) रेखाएँ दिखेंगी — जिस का मतलब है कि कुछ रँग अन्य रँगों से अधिक चमकीले हैं। ये चमकीली रेखाएँ हाइड्रोजन-जैसी गैसों द्वारा उत्सर्जित रँगों से मेल खाती हैं और हाइड्रोजन तत्त्व आकाशगङ्गाओं में सबसे अधिक पाया जानेवाला तत्त्व है। हमें पता चला कि हाइड्रोजन से जुड़ी एक चमकीली रेखा को जहाँ दिखना चाहिए था , वह वहाँ नहीं बल्कि उस से कहीं अधिक दाईं ओर (मतलब लम्बी तरङ्गदैर्घ्य वाली) स्थित है। इसे अभिरक्त विस्थापन (Red shift) कहते हैं। (यह सब तो आप को समझाने के लिए इतना सरल तरीके से लिखा गया है , काम तो बहुत जटिल था। NCRA के पास उपयुक्त spectrum नहीं था , किन्तु उन्होंने मौजूदा डाटा पर 21 फ़िल्टर्स के साथ उन्नत डाटा विश्लेषण करके इसी तरह का प्रभाव प्राप्त किया। हालाँकि मूल वैज्ञानिक सिद्धान्त समान ही हैं।)
अभिरक्त विस्थापन (Red shift) क्यों होता है ?
आइंस्टीन के सापेक्षता-सिद्धान्त के अनुसार , “ब्रह्माण्ड का विस्तार हो रहा है और यही अभिरक्त विस्थापन का कारण बनता है।” कल्पना करें कि एक गुब्बारे की सतह पर एक छोटी रेखा खींची गयी है। यदि गुब्बारे को और फुलाया जाए , तो उस की सतह खिंचती है और रेखा की लम्बाई बढ़ जाती है। ठीक वैसे ही जब प्रकाश विस्तारित हो रहे ब्रह्माण्ड में यात्रा करता है , तो उसकी तरंगदैर्घ्य खिंचकर बढ़ जाती है।
हम यह जानते हैं कि ब्रह्माण्ड कब से और कितनी तेजी से फैल रहा है। इसलिए अलकनन्दा के प्रकाश के अभिरक्त विस्थान की मात्रा (के मान) को देखकर हम गणना कर सकते हैं कि यह प्रकाश हम तक पहुँचने के लिए ब्रह्माण्ड में कब से चलायमान है।
और यह प्रकाश पिछले 12 अरब वर्षों से हम तक पहुँचने के चलायमान है।
अलकनन्दा से आये प्रकाश को हम तक पहुँचने में 12 अरब वर्ष लगे। आप सोच रहे होंगे कि यह महत्वपूर्ण क्यों है ? क्यों कि इस का मतलब है महाविस्फोट के 1.5 अरब वर्ष पश्चात् ही दो भुजाओं वाली एक साधारण सर्पिलाकार आकाशगङ्गा विद्यमान थी। खगोल भौतिकी वैज्ञानिकों के लिए यह असम्भव-सा प्रतीत होता है।
हम जानते हैं कि हमें पहुँचने वाला प्रकाश 12 अरब वर्ष पहले निकला था। इसका मतलब है कि हम आकाशगङ्गा को वैसा ही देख रहे हैं , जैसी वह 12 अरब वर्ष पहले दिखती थी। (हाँ! हम 12 अरब वर्ष पुराने अतीत में झाँक रहे हैं।) इसका मतलब है कि 12 अरब वर्ष पहले अलकनन्दा दो भुजाओं वाली एक सुगठित सर्पिल आकाशगङ्गा के रूप में विद्यमान थी। और महाविस्फोट 13.5 अरब वर्ष पहले हुआ था। इसका मतलब है कि यह आकाशगङ्गा महाविस्फोट के मात्र 1.5 अरब वर्ष बाद ही अस्तित्व में आ चुकी थी। (स्पष्टीकरण के लिए दूसरा स्पष्टीकरण — वास्तव में महाविस्फोट 13.8 अरब वर्ष पहले हुआ था जिसे मैं ने आसानी के लिए 13.5 लिखा है। परन्तु चिन्ता न करें , अलकनन्दा भी 12.3 अरब वर्ष पुरानी है जिसे मैं ने 12 अरब वर्ष लिखा था। इसलिए यह कथन कि अलकनन्दा महाविस्फोट के 1.5 अरब वर्ष बाद बनी थी — अभी भी सही है।)
अलकनन्दा की आयु इतनी महत्त्वपूर्ण क्यों है ?
महाविस्फोट तथा आकाशगङ्गाओं के निर्माण के बारे में हमारे सर्वोत्तम सिद्धान्तों के अनुसार , स्पष्ट और सुनिश्चित भुजाओं तथा केन्द्र में चपटी चक्रिका (डिस्क्) वाली सर्पिल आकाशगङ्गाएँ को बनने में कम से कम 3 अरब या 4 अरब वर्ष लगने चाहिए। 1.5 अरब वर्ष में ही ऐसी आकाशगङ्गा का बनना यह दर्शाता है कि हमारे सर्वोत्तम सिद्धान्त भी अपर्याप्त हैं।
आकाशगङ्गाएँ कैसे बनती हैं ?
महाविस्फोट ने ब्रह्माण्ड में बहुत सारा पदार्थ इधर-उधर फेंक दिया है जो कि चलायमान है।
कल्पना कीजिए एक ऐसे ब्रह्माण्ड की जो हाइड्रोजन परमाणुओं से भरा हो। गुरुत्वाकर्षण बल के कारण ये परमाणु धीरे-धीरे एक-दूसरे के निकट आने लगे। जैसे-जैसे अधिक से अधिक परमाणु एकत्रित हुए , वे गोलाकार गुच्छे/निगुम्फ (ब्लॉब्) का रूप लेने लगते हैं और ये गोलक (spheres) तारों में विकसित हो जाते हैं। फिर तारों के ये निगुम्फ/गुच्छे एक-दूसरे को आकर्षित करते हुए आकाशगङ्गाओं का निर्माण करते हैं।
ध्यान रखने वाली बात यह है कि महाविस्फोट के कारण हाइड्रोजन परमाणुओं के पास पहले से ही संवेग था। एक-दूसरे की ओर आकर्षित हो कर आकाशगङ्गाओं का निर्माण करने से पहले वे अलग-अलग दिशाओं में गति कर थे। विज्ञानियों ने इन परमाणुओं की गतियों के विस्तृत मॉडल तैयार किए हैं और प्रारम्भिक संवेग की जानकारी के आधार पर यह दिखाया जा सकता है कि किस प्रकार की आकाशगङ्गाएँ बनेंगी — गोलाकार , दीर्घवृत्तीय , चपटी चक्रिका , उभार वाली चक्रिका , भुजाओं वाली चक्रिका। जो कि अन्ततः सर्पिलाकार रूप धारण कर लेती हैं। इन सिद्धान्तों के अनुसार , प्रारम्भिक संवेग के कारण ही आकाशगङ्गाएँ घूमती हैं और समय के साथ उनमें सर्पिल भुजाएँ विकसित होती हैं। परन्तु इस प्रकार प्रक्रियाएँ लगभग-लगभग 3 अरब वर्ष का समय लेती हैं।
JSWT से पहले , खगोलविदों का मानना था कि ब्रह्माण्ड के आरम्भ की आकाशगङ्गाएँ तो अव्यवस्थित और अस्थिर होनी चाहिए थीं। आरम्भिक आकाशगङ्गाओं का “गर्म” और प्रक्षुब्ध होना भी अपेक्षित था। और यह भी अपेक्षित था कि इन को ठण्डा होने तथा ऐसी सु-गठित घूर्णन-प्रधान चक्रिका बनने में भी समय लगेगा जो कि सर्पिल पैटर्न् बनाये रखने में सक्षम हों।
योगेश वाडदेकर कहते हैं कि अलकनन्दा एक अलग कहानी बताती है। वे आगे कहते हैं , “इस आकाशगङ्गा को कुछ दस करोड़ वर्षों में 10 अरब सूर्यों के बराबर द्रव्यमान के तारे इकट्ठा करने पड़े और साथ‑ही-साथ सर्पिल भुजाओं वाली एक बड़ी चक्रिका (डिस्क) भी बनानी पड़ी। ब्रह्माण्डीय मानकों के हिसाब से यह बहुत ही तीव्र है।”
संक्षेप में कहें , तो हमारे मॉडल यह समझाने में लड़खड़ा रहें हैं कि महाविस्फोट के केवल 1.5 अरब वर्ष बाद ही चपटी केन्द्रीय चक्रिका और दो सु-स्पष्ट सर्पिल भुजाओं वाली आकाशगङ्गा विद्यमान कैसे हो सकती है।
चूँकि हमारे सिद्धान्तों के लिए ‘अलकनन्दा’ आकाशगङ्गा के अस्तित्व को समझाना कठिन हो रहा है इसलिए अच्छा यही होगा कि हम हमारे आकाशगङ्गा-निर्माण के सिद्धान्तों में बदलाव करें। यही वह कारण है कि NCRA पुणे द्वारा दो भुजाओं वाली सर्पिल आकाशगङ्गा की खोज बहुत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
यह कारनामा किस ने और कैसे किया ?
इस की खोज किसने की और कैसे ? NCRA की शोध-अध्येता राशि जैन और उन के सलाहकार @YWadadekar ने जेम्स् वेब् स्पेस् टेलीस्कोप (दूरदर्शित्र) के सार्वजनिक रूप से उपलब्ध डाटा में छानबीन कर रहे थे। वे विशेष रूप से उन पिण्डों को ढूँढते रहे थे जिन का अभिरक्त विस्थापन ≥ 3 हो। और तभी उन्हें इस के बारे में पता चला।
उन्हों ने एक सॉफ़्टवेयर् का प्रयोग कर के उन सभी पिण्डों की सूची बनायी जिन का अभिरक्त विस्थापन ≥ 3 था। इस का परिणाम यह हुआ कि उन्हें 2700 ऐसे पिण्ड मिले जिन का अभिरक्त विस्थापन ≥ 3 था। तदोपरान्त राशि ने सभी पिण्डों को बारी-बारी से यह सोच कर जाँचा कि शायद उन्हें इस में कीछ काम की जानकारी मिल जाये। तभी उन्हें एक सु-गठित सर्पिल आकाशगङ्गा दिखी। (इस का वैज्ञानिक नाम “विशालकाय अभिकल्पित सर्पिल” (Grand design Spiral) है।) राशि ने तुरन्त ही इसे योगेश को दिखाया। इस के बाद उन्हों ने अपने इस जानकारी की पुष्टि के लिए विभिन्न विश्लेषणात्मक परिक्षणों से गुजारा। और वे यह तब तक करते रहे , जब तक कि वे आश्वस्त न हो गये कि उन्हों ने ब्रह्माण्ड में एक असङ्गति खोज निकाली है।
ओपन साइंस ज़िंदाबाद!
जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप के विकास, लॉन्च या उसके डाटा सङ्ग्रहण में NCRA की कोई भूमिका नहीं थी , किन्तु सब के लिए यह डाटा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है। जिस के कारच NCRA के शोधकर्ताओं को यह अध्ययन तथा खोज को करने में सहायता मिली।
यह खोज इस बात का उत्तम उदाहरण है कि यदि विज्ञान को प्रतिलिप्यधिकारों से मुक्त रखा जाये , तो मानव-जाति बहुत ऊँचाइयों को छू सकती है।
इस का नाम “अलकनन्दा” ही क्यों ?
हमारी आकाशगङ्गा का अँग्रेजी में नाम Milky way है और इस का हिन्दी में नाम “मन्दाकिनी” है। हिमालय की एक नदी का भी नाम “मन्दाकिनी” है। और हमारी इस नयी खोजी गयी आकाशगङ्गा भी हमारी आकाशगङ्गा-जैसी ही है , इसी लिए इस का नाम “अलकनन्दा” है। वैसे हिमालय की एक नदी का नाम भी अलकनन्दा है। इसी लिए शोधकर्ताओं ने इस के लिए यह नाम चुना है।
अधिक जानकारी
शोध के अधिक विवरण के लिए official press release देखें (यह हिंदी और मराठी में भी उपलब्ध है)। इसमें बहुत-सी उपयोगी जानकारी है—उदाहरण के लिए: यह खोज जेम्स वेब अंतरिक्ष दूरबीन के बिना क्यों संभव नहीं थी, गुरुत्वीय लेंस के बिना क्यों संभव नहीं थी, इन्फ्रारेड दूरबीन के बिना क्यों संभव नहीं थी, और यह खोज महत्वपूर्ण कैसे है—क्योंकि अलकनंदा कोई गरम आकाशगंगा नहीं, बल्कि एक ठंडी आकाशगंगा है।
इससे भी अधिक विवरण के लिए मूल शोधपत्र देखें—यह शोध यूरोप की पत्रिका Astronomy & Astrophysics में प्रकाशित हुआ है, जो इस क्षेत्र की सर्वोच्च पत्रिकाओं में से एक है।
या आप लेखकों से संपर्क कर सकते हैं: rjain@ncra.tifr.res.in
योगेश वाडदेकर ट्विटर पर सक्रिय हैं: @YWadadekar और @NCRA_Outreach NCRA का आधिकारिक हैंडल है।





